नेपाल एवं अयोध्या की आध्यात्मिक यात्रा
यात्रा वृत्तांत | विमल भट्ट
कुछ यात्राएँ केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचने का माध्यम नहीं होतीं, बल्कि वे जीवनभर के लिए ऐसी यादें दे जाती हैं, जिन्हें शब्दों में समेट पाना आसान नहीं होता। नेपाल और अयोध्या की यह आध्यात्मिक यात्रा भी ऐसा ही एक अद्भुत, सुखद एवं अविस्मरणीय अनुभव रही, जिसमें आस्था, भक्ति, प्रकृति, संस्कृति और पारिवारिक आत्मीयता का अनूठा संगम देखने को मिला।
दिनांक 24 अक्टूबर 2026 को श्रीमती चन्द्रकला ढौंडियाल एवं श्री मुकेश ढौंडियाल के कुशल नेतृत्व में 13 सदस्यीय दल ने नेपाल एवं अयोध्या की आध्यात्मिक यात्रा का शुभारंभ किया। मन में देवी-देवताओं के दर्शन की अभिलाषा, नई जगहों को देखने का उत्साह और अपनों के साथ कुछ यादगार पल बिताने की उमंग लिए हम सभी अपनी यात्रा पर निकल पड़े।
काठमांडू में पशुपतिनाथ के दर्शन से हुआ यात्रा का शुभारंभ

हमारी यात्रा का पहला पड़ाव नेपाल की राजधानी काठमांडू रहा। यहाँ पहुँचकर सबसे पहले विश्वप्रसिद्ध श्री पशुपतिनाथ मंदिर में भगवान भोलेनाथ के दर्शन किए। मंदिर का आध्यात्मिक वातावरण, मंत्रोच्चार और श्रद्धालुओं की अटूट आस्था मन को अद्भुत शांति प्रदान कर रही थी।
इसके पश्चात काठमांडू में ही हमने संभा महादेव मंदिर, ढोलेश्वर महादेव मंदिर एवं गहेश्वरी देवी मंदिर में दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। बूढ़ा नीलकंठ में भगवान विष्णु की शेषनाग पर शयन करती हुई भव्य प्रतिमा के दर्शन करना अपने आप में एक अद्भुत अनुभव था। इसके साथ ही गौतम बुद्ध स्तूप के दर्शन कर वहाँ की शांति, भव्यता और बौद्ध संस्कृति को करीब से महसूस करने का अवसर मिला।
एक ही दिन में इतने पवित्र एवं ऐतिहासिक स्थलों के दर्शन कर मन श्रद्धा और आनंद से भर उठा।
मनकामना देवी के दरबार में आशीर्वाद
अगले दिन हमारी यात्रा की शुरुआत प्रसिद्ध माँ मनकामना देवी मंदिर के दर्शन के साथ हुई। मान्यता है कि माँ के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मनोकामना पूर्ण होती है। माँ के चरणों में शीश नवाकर सभी ने परिवार की सुख-समृद्धि एवं खुशहाली की कामना की।
माँ का आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद हम नेपाल के खूबसूरत शहर पोखरा की ओर रवाना हुए। रात्रि विश्राम पोखरा में हुआ। प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण इस शहर का वातावरण और पहाड़ों की खूबसूरती यात्रा की थकान को दूर करने के लिए पर्याप्त थी।
पोखरा में महादेव और माँ विंध्यवासिनी के दर्शन
अगली सुबह पोखरा में हमारी आध्यात्मिक यात्रा आगे बढ़ी। सर्वप्रथम गुप्तेश्वर महादेव मंदिर पहुँचकर भगवान शिव के दर्शन किए और उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके बाद माँ विंध्यवासिनी देवी के मंदिर में पहुँचकर माँ के चरणों में शीश नवाया।
मंदिरों में दर्शन और पूजा-अर्चना के बाद दोपहर लगभग 12 बजे हम सभी अयोध्या धाम के लिए रवाना हो गए। नेपाल की आध्यात्मिक एवं प्राकृतिक सुंदरता को पीछे छोड़ते हुए अब मन में मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम की नगरी अयोध्या पहुँचने की उत्सुकता थी। लंबी यात्रा के बाद रात्रि विश्राम अयोध्या में किया।
अयोध्या धाम में रामलला के दर्शन और करवाचौथ का अद्भुत संयोग
अगली सुबह अयोध्या में एक नए उत्साह और भक्ति भाव के साथ दिन की शुरुआत हुई। सर्वप्रथम पवित्र सरयू नदी में स्नान कर पुण्य लाभ प्राप्त किया। सरयू के निर्मल जल में स्नान करना अपने आप में एक विशेष आध्यात्मिक अनुभूति थी।
इसके पश्चात हनुमानगढ़ी मंदिर पहुँचकर संकटमोचन बजरंगबली के दर्शन किए और उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। फिर वह पावन क्षण आया, जिसका हम सभी को बेसब्री से इंतजार था। भव्य श्रीराम मंदिर में प्रभु श्रीराम के बाल स्वरूप रामलला के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
रामलला के दर्शन कर मन भावविभोर हो उठा। ऐसा लगा मानो वर्षों की प्रतीक्षा और आस्था उस एक पल में साकार हो गई हो।
इस यात्रा को और भी विशेष बनाने वाला एक अद्भुत संयोग यह रहा कि जिस दिन हम अयोध्या में थे, उसी दिन सुहागिन महिलाओं का पवित्र पर्व करवाचौथ भी था।
इससे सुखद और क्या हो सकता था कि प्रभु श्रीराम की पावन नगरी में करवाचौथ जैसा महत्वपूर्ण पर्व मनाने का अवसर मिला!
शाम को हम सभी सरयू नदी के तट पर पहुँचे और वहाँ आयोजित भव्य माँ सरयू की आरती में सम्मिलित हुए। आरती के दौरान दीपों की जगमगाहट, मंत्रोच्चार और भक्ति संगीत से पूरा वातावरण दिव्य हो उठा। इसके पश्चात सभी ने श्रद्धापूर्वक सरयू नदी में दीपदान किया।
रात्रि में चंद्रमा के उदय होने पर समूह की सुहागिन महिलाओं ने अयोध्या की पावन धरती पर ही अपना करवाचौथ व्रत पूर्ण किया। प्रभु श्रीराम की नगरी, माँ सरयू का पवित्र तट और करवाचौथ का पावन पर्व—यह संयोग हमारी यात्रा का सबसे भावुक, सुंदर और यादगार पल बन गया।
यादों का कारवां लेकर वापसी
दिनांक 30 अक्टूबर 2026 को हम सभी अयोध्या से देहरादून के लिए वापस रवाना हो गए। लगभग एक सप्ताह की इस यात्रा में हमने नेपाल के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों, प्राकृतिक सौंदर्य, ऐतिहासिक धरोहरों और अयोध्या की दिव्यता को करीब से महसूस किया।
इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल इतने सारे मंदिरों के दर्शन करना नहीं था, बल्कि 13 सदस्यों के साथ बिताया गया समय, आपसी सहयोग, हँसी-मजाक, एक-दूसरे के प्रति अपनापन और साथ मिलकर बनाए गए अनगिनत यादगार पल भी थे।
श्रीमती चन्द्रकला ढौंडियाल एवं श्री मुकेश ढौंडियाल के कुशल नेतृत्व और सभी 13 सदस्यों के सहयोग से यह यात्रा अत्यंत सुखद एवं सफल रही।
अंततः यही कहूँगा कि नेपाल से लेकर अयोध्या तक की यह यात्रा हमारे लिए केवल एक पर्यटन यात्रा नहीं, बल्कि आस्था, विश्वास और आध्यात्मिक अनुभूति का एक सुंदर अध्याय बन गई।
कुछ दृश्य आँखों में बस जाते हैं, कुछ पल दिल में उतर जाते हैं और कुछ यात्राएँ जीवनभर याद रहती हैं। नेपाल एवं अयोध्या की यह यात्रा भी उन्हीं अविस्मरणीय यादों में सदैव जीवित रहेगी।
जय पशुपतिनाथ!
जय माँ मनकामना!
हर हर महादेव!
जय श्रीराम!
— विमल भट्ट
